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बाबर ने नही तो आखिर किसने तोड़ा अयोध्या में राम का मंदिर?

Thursday, 23 Jan 2020 10:40:26 AM

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आइए पहले हम ऐतिहासिक तथ्य को जान लेते हैं। बाबर ने अयोध्या में राम मंदिर को कभी नष्ट नहीं किया। वास्तव में, वह कभी अयोध्या पहुँचा ही नहीं। इसके अलावा, भारत पर उसका कुल शासन सिर्फ 2 साल पहले तक था, क्योंकि वह जहर खाने के कारण बीमार पड़ गया और उसकी मृत्यु हो गई।

मंदिर के विध्वंस या बाबरी मस्जिद की स्थापना में बाबर की कोई भूमिका नहीं थी।

यह औरंगजेब के शासनकाल के बहुत साल बाद का समय था, जब औरंगजेब ने विभिन्न मंदिरों को नष्ट करने और उन्हें मस्जिदों में बदलने का आदेश दिया। ऐसा ही एक मंदिर अयोध्या में राम मंदिर था जिसे उन्होंने विशेष रूप से नष्ट किया था क्योंकि अयोध्या सभी हिंदुओं द्वारा पूजनीय थी। उन्होंने अयोध्या में मस्जिद बनवाई जिसका नाम बाबरी मस्जिद रखा गया।

अब, औरंगजेब को किसी ने क्यों नहीं रोका? खैर, वह भारतीय उपमहाद्वीप का शासक था, पूर्वी तट से पश्चिमी तट तक , दक्षिण में हैदराबाद क्षेत्र उत्तर में पेशावर तक सभी का। इस अत्याचारी के खिलाफ खड़ा होने और उसे रोकने के लिए किसी के पास हिम्मत नहीं थी? उस समय कोई लोकतंत्र नहीं था।

यद्यपि, शिवाजी और उनके पुत्र संभाजी थे, जो महाराजा क्षेत्र में क्रांति शुरू कर रहे थे, जिन्होंने कई बार औरंगजेब का विरोध किया था। वे औरंगज़ेब की कैद से एक बार भागने में भी सफल रहे। लेकिन, अंत में शिवाजी की मृत्यु के बाद, औरंगजेब ने संभाजी को पकड़ लिया और उन्हें मारने से पहले उनके साथ क्रूरतापूर्वक अत्याचार किया।

हम बस उन लोगों को यह साफ़ करना चाहते हैं जिनका यह कहना है कि मस्जिद बाबर के आदेश पर मीर बाक़ी द्वारा बनाई गई थी। इसमें थोड़ी समस्या है। यह भ्रम इसलिए पैदा होता है क्योंकि मस्जिद के शिलालेखों में उल्लेख है कि यह बाबर इन 1528-29 द्वारा आदेशित मीर बाक़ी द्वारा बनाया गया था। परंतु,बाबर कभी अयोध्या नहीं पहुंचा। वह ऐसी संरचना को ध्वस्त करने का आदेश क्यों देगा जो उसने कभी नहीं देखी थी?

बाबर ने 1526 ईस्वी में पानीपत की लड़ाई लड़ी और 1530 में उसकी मृत्यु हो गई। इसलिए उसका शासन भारत में बहुत छोटा था। इस बेहद छोटी अवधि में, उनके द्वारा बनाया कोई अन्य स्मारक नहीं मिलता है, लेकिन वह एक ऐसे शहर में एक मस्जिद बनाने का आदेश देता है जिस शहर में वह उस मंदिर को देखने कभी गया ही नहीं। इसके अलावा, उस समय, वास्तव में कभी भी हिंदू मुस्लिम का संघर्ष नहीं था, क्योंकि यह इतना छोटा शासनकाल था।

उस स्थान पर जाने वाले विभिन्न यात्रियों ने 1717 तक अपने कामों में इस मस्जिद का कभी उल्लेख नहीं किया। बाबरी मस्जिद का पहला उल्लेख 1717 में मिलता है। इससे पहले के सभी लेखों में राम के एक महल का उल्लेख है जो स्थानीय लोगों द्वारा वंदित था।

इस घटना का उल्लेख बाबरनामा में भी नहीं है जो कि उनके जीवन की किताब है।

वास्तव में हिंदू मुस्लिम विभाजन और मंदिरों का बड़ा विनाश औरंगज़ेब के शासनकाल के दौरान हुआ, जिसके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने बहुत से हिंदुओं को धर्मांतरण के लिए प्रताड़ित किया, मंदिरों को नष्ट किया और उन्हें मस्जिदों से बदलने का आदेश दिया।

यह कहना है एक पूर्व आईपीएस अधिकारी किशोर कुणाल ने अपनी किताब में यह दावा किया है कि अयोध्या में राम मंदिर को बाबर के नहीं बल्कि मुगल शासक औरंगजेब के शासनकाल में तोड़ा गया था ।

आखिर कौन है किशोर कुणाल

सन 1972 में गुजरात कैडर के पूर्व आईपीएस अधिकारी रह चुके किशोर कुणाल गृह मंत्रालय मेंओएसडी के पद पर रह चुके हैं और अयोध्या में सन् 1992 में विवादित ढांचा गिराए जाने केपूर्व सन 1990 में अयोध्या मामले में आधिकारिक रुप से जुड़े रहे | सेवानिवृत होने के बादकिशोर कुणाल के एस डी संस्कृत विश्वविद्यालय दरभंगा के कुलपति रहे हैं जिसके बाद आईपीएसअधिकारी किशोर कुणाल ने बिहार धर्मादा बोर्ड के अध्यक्ष के रूप में पद संभाला वर्तमान मेंयही उनकी पहचान है आपको बता दें कि किशोर कुणाल का अयोध्या से पुराना नाता रहा हैअयोध्या के अमावां मंदिर ट्रस्ट से जुड़े रहने के कारण अक्सर किशोर कुणाल आयोध्या आते रहे हैं और अयोध्या के संत व् धर्माचार्यों महन्तों के बीच किशोर कुणाल की अच्छी पहचान है |

पूर्व आईपीएस अधिकारी किशोर कुणाल ने अपनी किताब में यह दावा किया है कि अयोध्या में जिस राम मंदिर को गिराने का दावा बाबर के शासनकाल के दौरान कियाजा रहा है वह बाबर के नहीं बल्कि मुगल शासक औरंगजेब के शासनकाल में तोड़ा गया था, किशोरकुणाल की इस किताब में लिखी गई बातों से अब इतिहासकारों में नई बहस शुरु होना लाज़मी है |

किस आधार पर पूर्व आईपीएस अधिकारी किशोर कुणाल कर रहे हैं यह दावा

अयोध्या में मंदिर मस्जिद मामले जैसे अंतर्राष्ट्रीय मुद्दे पर नई जानकारी देने वाले पूर्वआईपीएस अधिकारी किशोर कुणाल ने ब्रिटिश काल की पुरानी फाइलों पुरातत्व खुदाई की समीक्षा और प्राचीन संस्कृत पुस्तकों और सामग्रियों के हवाले से यह बताने की कोशिश की हैकि अयोध्या में विवादित स्थल पर भगवान राम का मंदिर मौजूद था जिस पर बाद में मस्जिदबनाई गई किशोर कुणाल की इस किताब की प्रस्तावना पूर्व प्रधान न्यायाधीश जीबीपटनायक ने लिखी है जिसमें उन्होंने लिखा है कि किताब को लिखने वाले लेखक ने अयोध्या के इतिहास को नया आयाम दिया है और सही तथ्यों को स्थापित किया है जो आम धारणा और कई इतिहासकारों के मतों के विपरीत है ।

बाबरी मस्जिद के बारे में क्या कहता है इतिहास

अयोध्या के विवादित स्थल पर 6 दिसंबर सन 1992 को गिराए गए विवादित ढांचे के बारे मेंइतिहास में यही दर्ज है की मस्जिदनुमा इस ढांचे को भारत के पहले मुगल सम्राट बाबर के आदेशपर सन 1527 में बनवाया गया था और मुगल सम्राट बाबर के सेनापति मीर बाकी ने इसकानाम बाबरी मस्जिद रखा था सन 1940 के दशक के पहले इस मस्जिद को उर्दू में जन्म स्थान की मस्जिद और हिंदी में मस्जिद ए जन्मस्थान भी कहा जाता था हिंदू धर्म के लोग भगवान श्रीराम की जन्म भूमि के रूप में स्वीकार करते रहे हैं वही मीर बाकी ने इस ढाँचे का नाम बाबरी मस्जिद रखा था जिसे मुस्लिम धर्म के लोग मस्जिद के नाम से पहचानते थे ।

पूरी दुनिया में हिंदू मुसलमानों में मजहब के नाम पर एक गहरी लकीर खींचने वालेअयोध्या के बाबरी मस्जिद राम मंदिर मामले के बारे में लगभग देश का हर नागरिक जानता हैऔर अभी तक आम जानकारी के मुताबिक हिंदू पक्ष द्वारा यह दावा किया जाता रहा है कि अयोध्या में स्थापित भगवान श्री राम के प्राचीन मंदिर को बाबर ने ढहा दिया था और यहां पर एक विशाल मस्जिद का निर्माण करवाया था जिसे बाद में लोगों ने बाबरी मस्जिद के नाम से जाना |

इस आलेख में दी गई जानकारी मात्र सामान्य जनरूचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है। किशोरकुणाल की इस किताब में लिखी गई बातों से अब इतिहासकारों में नई बहस शुरु होना लाज़मी है |

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