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डांसिंग प्लेग क्या रोग था जिसमें लोग नाचते हुए मौत को प्यारे हो गए थे

Monday, 03 Feb 2020 11:29:39 AM

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‘डांसिंग प्लेग‘ एक ऐसा डांस था, जिसे एक औरत ने शुरू किया और फिर लोग इससे जुड़ते गए. मग्न होकर नाचते हुए लोगों ने तब तक खुद को नहीं रोका, जब तक उनकी मौत नहीं हो गई. वे डांस करने में इतना खोए हुए थे कि मौत आने का आभास तक नहीं हो रहा था. सुनने में यह कोई किवदंति लग सकती है, पर यह स्ट्रासबर्ग की सच्ची घटना थी. गजब की बात तो यह है कि इसका रहस्य अब भी अनसुलझा है.

चूंकि, इस ‘डांसिंग प्लेग’ के चलते तकरीबन 400 लोगों मौत की नींद सो गए थे, इसलिए इससे जुडे़ पहलुओं को जानना दिलचस्प हो जाता है—

क्या था ‘डांसिंग प्लेग’ ?

इतिहास में इस घटना के शुरू होने और खत्म होने की कोई सही तारीख दर्ज नहीं है. फिर भी माना जाता है कि यह घटना सन 1518 में यूरोप के स्ट्रासबर्ग में की घटी थी. घटना के अनुसार एक दिन अचानक ही स्ट्रासबर्ग में रहने वाली सामान्य सी औरत ‘फ्राउ ट्रॉफी’ अपने घर से नाचते हुए बाहर आंगन में आ गई. संगीत की कोई धुन आस-पास नहीं बज रही थी, लेकिन फ्राउ ट्रॉफी अपनी ही धुन में मग्न थी. उसे एहसास तक नहीं था कि आखिर वह कहां है? आंगन से निकलकर नाचते हुए वह सड़क पर आ गई.

उसे देखने वालों का हुजूम जमा होने लगा. किसी ने उसे पागल कहा, तो किसी ने समझा कि उसे दौरा आ गया है. कुछ लोग उसे देखकर हंस भी रहे थे. हालांकि, फ्राउ ट्रॉफी इन सब बातों से बेखबर बस नाच रही थी. उसके कदम रुकने को तैयार नहीं थे. वह नाचते हुए सड़क के हर किनारे को छू रही थी और लोग उसे देखकर डर कर पीछे हो रहे थे. नाचते वक्त उसके चेहरे पर ना तो खुशी थी न गम. बस वह बिना किसी भाव के नाचे जा रही थी. घंटों बीत गए, पर उसका नाचना बंद नहीं हुआ. लोगों के आश्चर्य की सीमा तब पार हो गई, जब उसके आस-पास के लोगों ने भी नाचना शुरू कर दिया. फ्राउ ट्रॉफी के पड़ोसी और परिवार के लोग भी धीरे-धीरे इस नाच के शामिल हो गए. फिर देखते ही देखते सड़क पर करीब 34 लोग नाचने लगे. उनमें से कोई रूकने को तैयार नहीं था.

दिलचस्प बात तो यह थी कि इन लोगों को नाचने के लिए किसी संगीत की जरूरत नहीं पड़ी. न ही वे एक जैसी ताल में नाच रहे थे. इनमें से कोई भी खुश नहीं दिख रहा था. उनके चेहरे पर कोई भाव तक जाहिर नहीं हो रहा था. बस वे नाचे जा रहे थे. उन्हें देखकर कुछ देर, तो लोग रुके फिर सबकुछ सामान्य हो गया. सुबह से रात होने को आई पर नाचना बंद नहीं हुआ. इनमें से किसी ने भी ना पानी पिया न खाना खाया. लोग उन्हें रूकने के लिए कह रह थे, पर ऐसा लग रहा था कि कोई कुछ सुन ही नहीं पा रहा है. दिन के बाद रात गुजरी और फिर अगला दिन और रात गुजरने लगी. तभी कुछ लोग थकान के कारण जमीन पर गिरे.. उनके साथियों ने तब भी रुकना जरूरी नहीं समझा. गिरते हुए लोगों ने हांफते हुए दम तोड़ दिया. एक-एक कर करीब 15 लोगों की मौत हो गई, फिर भी डांस नही रूका. अब प्रशासन की चिंता बढ़ने लगी. उन्होंने नाच रोकने के लिए उस जगह पर आग लगा दी. बावजूद इसके नाचने वालों पर कोई असर नही हुआ.

इस बीच यूरोप के अन्य हिस्सों से भी ऐसी ही घटनाओं की जान कारियां आने लगी. अधिकांश लोगों ने इसे भूत-प्रेत और तंत्र विद्या से जोड़कर देखा, तो कई लोगों ने इसे महामारी बताया. प्रशासन की तमाम कोशिशें नाकाम रही. लोग नाचते रहे और मरते रहे. कुछ की मौत थकान से हुई और कुछ दिल के दौरे से मर गए, तो कुछ ने कमजोरी के कारण दम तोड़ दिया.

फिर एक सुबह… सड़कें वीरान थीं. कहीं कोई नहीं नाच रहा था. हर जगह से यह तमाशा बंद हो गया. प्रशासन की नजर में यह एक तरह का प्लेग था, जिसने लगभग 400 लोगों की जान ले ली. इतिहासकारों ने इसे ‘डांसिंग प्लेग’ का नाम दिया है. अब तक कोई नहीं जानता कि आखिर डांसिंग प्लेग किस रहस्य के साथ शुरू हुआ, और कैसे खत्म हुआ? घटना के बाद ‘फ्राउ ट्रॉफी’ को तलाश करने की काफी कोशिश की गई, लेकिन उसके बारे में कोई सुराग नहीं मिला.

डांसिंग प्लेग अचानक शुरू हुआ था और एक रहस्य के साथ खत्म भी हो गया. इस घटना के दौरान, जहां चिकित्सक इसे मनोविज्ञान ने जोड़कर देख रहे थे. वहीं कुछ लोगों ने इसे तंत्र साधना का असर बताया. विभिन्न मतों के बीच यह बात कही गई कि यूरोप में 200 से 500 ईसा पूर्व अंधकार युग था. यानी, लोगों को चमत्कार…शैतानी ताकतों पर विश्वास था. मध्ययुग की शुरुआत के साथ ही इन धारणाओं में कमजोरी आई, लेकिन यह पूरी तरह से खत्म नहीं हुई. 14वीं और 15वीं शताब्दी में यूरोप में कई ऐसी घटनाएं हुईं, जहां महिलाओं को डायन मानते हुए जिंदा आग के हवाले कर दिया गया था. उस समय राजा का जनता के प्रति क्रूर व्यवहार भी इस तरह की घटनाओं की वजह बना.

जब ‘डांसिंग प्लेग’ की घटना हुई, तब यही अंदाजा लगाया गया कि लोगों पर किसी डायन या भूत का साया है, जो धीरे-धीरे उनकी जान ले रहा है. इतिहासकार जॉन वालेर ने अपनी किताब ‘ए टाइम टू डांस, ए टाइम द डाय: द एक्स्ट्राऑर्डिनरी स्टोरी ऑफ द डांसिंग प्लेग ऑफ 1518’ ने इस पूरी घटना को विस्तार से लिखा है.

15वीं शताब्दी में मनोविज्ञान के क्षेत्र में कोई खास तरक्की नहीं हुई थी. ऐसे में लोगों का मत यही रहा कि कोई भी मानसिक अवस्था, जिसमें व्यक्ति आम आदमी की तरह व्यवहार नहीं करता है, तो वह प्रेत की चपेट में है. वे उसे तांत्रिक और ओझा के पास ले जाते थे. मानसिक रोगों की व्याख्या ठीक से न होने के कारण ऐसे मत प्रचलित हुए.

1952 में यूजीन बैकमैन ने अपनी किताब ‘रिलीजियन डांस इन दा क्रिश्चन चर्च एंड इन पॉपुलर मेडिसिन’ में जिक्र किया है कि ईसाई धर्म में ईश्वर भक्ति में नाचने की प्रथा रही है. जो बिना किसी भाव के केवल ईश्वर के लिए नाचते हैं. ताकि, ईश्वर उन्हें देखकर प्रसन्न हों. उन्होंने डांसिंग प्लेग को महामारी मानने से साफ इंकार किया है. वे कहते हैं कि लोगों ने नृत्य के जरिए सांसारिक जीवन से मुक्ति पाने का मार्ग खोज लिया था.

हालांकि, यह पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है कि वे योजनाबद्ध होकर ऐसा कर रहे थे या एक दूसरे से प्रेरित होकर नाच में शामिल हुए!

क्या वाकई महामारी का असर था

धर्म से अलग हटकर बात की जाए तो कुछ चिकित्सकों और इतिहासकारों ने डांसिंग प्लेग को महामारी माना है. हालांकि, उन्होंने भी इसे मानसिक रोग से जोड़कर ही देखा है. वेंडरबिल्ट मेडिकल कॉलेज के प्रोफेसर टिमोथी जोन्स ने इसके पीछे थ्योरी दी है कि यूरोप और फ्रांस के देशों में 14वीं से 16वीं शताब्दियों के दौरान मौसम में अचानक से परिवर्तन देखे गए. कई बार यहां तेज गर्मी प ड़ती और सूखे के कारण फसले नष्ट हो जाती, तो कई बार तेज बारिश के साथ ओले गिरते. हर मौसम का प्रकोप यहां की जमीन को तो बंजर बना ही रहा था. साथ ही लोगों में कई तरह की बीमारियां जैसे मोतियाबिंद, सिफलिस, कुष्ठ रोग भी फैल रहे थे. आर्थिक और शारीरिक रूप से आ रही इस कमजोरी ने लोगों के मनो-भाव पर काफी गहरा असर डाला था. अकाल के कारण मरने वालों में संख्या बढ़ रही थी और बीमार लोगों में अपंगता आ रही थी. 1518 के दौरान यूरोप में डांसिंग प्लेग की घटनाएं सात गुना बढ़ गईं थीं.

धार्मिक और वैज्ञानिक तर्कों के बीच यह सत्य नहीं मिट सकता कि नाचते हुए लोगों का मरना प्रकृति की सबसे अनोखी घटना रही!

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