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मुस्लिमों की मुताह प्रथा क्या है

Saturday, 15 Feb 2020 11:44:49 AM

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Mutah प्रथा कॉन्ट्रैक्ट मैरिज होती।जिसको मज़े के लिए की गई शादी भी कह सकते हैइस्लाम मै वैश्य वृती हराम मानी जाती है जिस्म बेचने ओर खरीदने दोनों पर पाबंदी है तो ये एक तरह की अय्यासी का जरिया है जिसकी इजाजत खुद इस्लाम इस्लाम देता है ।

इस्लाम में तीन तलाक के बाद अब मुता विवाह और मिस्याही विवाह के खिलाफ मांग उठने लगीहै. हैदराबाद के रहने वाले मौलिम मोहसिन बिन हुसैन ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करमुसलमानों में प्रचलित मुता और मिस्यार निकाह को अवैध और रद्द घोषित करने की मांग की है. इसी बीच मुता निकाह जिसके खिलाफ लोग सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए हैं.

इस विवाह मै एक निश्चित समयावधि रखी जाती है जैसे ३ दिन ,१ दिन या फिर कुछ घंटे इसके लिए पुरुष ओर औरत दोनों की रजामंदी ली जाती है ओर मेहर के वक़्त रकम अदा कर दी जाती है।एक बार टाइम निश्चित होने के बाद इसको बदला नहीं जा सकता । साधारण शादी मै मेहर की रकम के लिए औरत हक जता सकती है मगर इसमें नहीं।

इस्लाम में तीन तलाक के बाद अब मुता विवाह और मिस्याही विवाह के खिलाफ मांग उठने लगी है. हैदराबाद के रहने वाले मौलिम मोहसिन बिन हुसैन ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर मुसलमानों में प्रचलित मुता और मिस्यार निकाह को अवैध और रद्द घोषित करने की मांग की है. इसी बीच जानते हैं क्या है मुता निकाह जिसके खिलाफ लोग सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए हैं.

मुता विवाह एक निश्चित अवधि के लिए साथ रहने का करार होता है और शादी के बाद पति-पत्नी कॉन्ट्रेक्ट के आधार पर एक अवधि तक साथ रह सकते हैं. साथ ही यह समय पूरा होने के बाद निकाह खुद ही खत्म हो जाता है और उसके बाद महिला तीन महीने के इद्दत अवधि बिताती है.

मुताह निकाह की कुछ शर्तें होती है. जैसे:

. पवित्र हो.

.लड़की नाबालिग़ न हो.

.व्यभिचार में लिप्त न हो.

.वो पहले से शादीशुदा न हो.

उसका मुस्लिम होना ज़रूरी है.

सभी बाते औरतों के लिए है मतलब वेश्यावृति कर रहे है खुलमखुला पर नाम विवाह का।

आदमी किसी से भी ये विवाह कर सकते है मतलब पारसी ,यहूदी,ओर मुस्लिम जबकि औरत सिर्फ मुस्लिम से कर सकती है ये विवाह , इसमें तलाक की जरूरत नहीं होती निश्चित समय के बाद ये अपने आप खत्म हो जाती है

इसके बाद भी नियम है वो भी औरतों के लिए इसको बोलते है iddat इद्दत चार महीने दस दिन की उस मियाद का नाम है, जिसमें औरत एकांतवास में, किसी भी मर्द की छाया से परे समय गुज़ारती है. उसके बाद ही वो किसी और से शादी के लिए लायक बन सकती है.

मुताह , एक आदमी जितने चाहे कर सकता है।ओर एक औरत भी ।इस बीच अगर औरत गर्भवती हों जाए तो उस आदमी की कोई जिममेदारी नहीं ।ये प्रथा सिया मुसलमानों मै प्रचलित है सुन्नी मै ऐसी ही missyar होती है ।

मुता विवाह एक निश्चित अवधि के लिए साथ रहने का करार होता है और शादी के बाद पति-पत्नी कॉन्ट्रेक्ट के आधार पर एक अवधि तक साथ रह सकते हैं. साथ ही यह समय पूराहोने के बाद निकाह खुद ही खत्म हो जाता है और उसके बाद महिला तीन महीने के इद्दतअवधि बिताती है.

हैदराबाद के व्यक्ति ने याचिका दाखिल कर शिया मुसलमानों में प्रचलित मुता और सुन्नी मेंप्रचलित मिस्यार निकाह को अवैध और रद्द घोषित करने की मांग की है. बता दें यह निकाहअवधि खत्म होते ही खुद ही खत्म हो जाता है.

इरशाद अहमद वानी की किताब द सॉशियोलॉजी के अनुसार मुता निकाह की अवधि खत्म होनेके बाद महिला का संपत्ति में कोई हक नहीं होता है और ना ही वो पति से जीविकोपार्जन केलिए कोई आर्थिक मदद मांग सकती है. वहीं सामान्य निकाह में महिला ऐसा कर सकती है.

मुता विवाह में पत्नी के पास मेहर की रकम लेने का कोई अधिकार नहीं होता है, जबकि सामान्य निकाह के बाद अलग होने पर ये रकम ली जा सकती है. बता दें कि मेहर की रकम शादी के वक्त तय की जाती है और यह घरवालों की आर्थिक स्थिति के आधार पर आपस में तयहोती है.

बताया जाता है कि मुता विवाह में तय हुई शादी की अवधि के दौरान पैदा होने वाले बच्चे को पिता की संपत्ति में शेयर भी दिया जाता है. हालांकि लोगों को मानना है कि इस विवाह से पैदा हुए बच्चे को उतनी इज्जत नहीं दी जाती है.

कुछ भी हो हर हाल में दुर्गति या फजीहत औरतों की होती है । मेरा यह मानना है की इस कुप्रथा पर हर हाल में रोक लगनी चाहिए।

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