इस तरह नवरात्रि के दूसरे दिन देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा करें

Thursday, 26 Mar 2020 02:04:59 PM

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नवरात्रि की शुरुआत हो चुकी है। नवरात्रि का त्यौहार पिछले 25 मार्च से शुरू हुआ है और यह त्यौहार सभी हिंदुओं के लिए मुख्य माना जाता है। यह त्यौहार नौ दिनों का होता है, जिसमें श्रद्धालु उपवास रखते हैं और देवी के सामने अपनी इच्छा रखते हैं। इन दिनों में मां को प्रसन्न करने के लिए पूजा की जाती है। आज का दिन देवी ब्रह्मचारिणी का दिन है। नवरात्रि के दूसरे दिन देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। आज हम आपको इसकी पूजा विधि बताने जा रहे हैं, कैसे आप इनकी पूजा कर सकते हैं।

पूजन - सबसे पहले देवी ब्रह्मचारिणी जी की पूजा के लिए कलश को फूल, अक्षत, रोली, चंदन, दूध, दही, शक्कर, पिघले हुए मक्खन के साथ देवी और लोक और योगियों की पूजा करें और शहद चढ़ाएं। स्नान। अब इसके बाद, आप देवी को जो भी प्रसाद चढ़ा रहे हैं, आपको उनका एक हिस्सा भी अर्पित करना चाहिए। अब प्रसाद और उसके बाद प्रसाद, सुपारी चढ़ाएं। इसके बाद इसी तरह नवग्रह, दशदिक्पाल, नगर देवता, ग्राम देवता की पूजा करें।
पूजा करने के बाद देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा करें। अब देवी की पूजा करते समय सबसे पहले अपने हाथों में फूल लेकर प्रार्थना करें। अब ऐसा करने के बाद, देवी को पंचामृत स्नान कराएं और फिर फूल, अक्षत, कुमकुम, सिंदूर, सभी तरह से चढ़ाएं और देवी को लाल फूल पसंद हैं। इसके बाद घी और कपूर मिलाकर देवी की आरती करें।



यह प्रार्थना करो

आवाहनं न जानामि न जानामि वस्रिणं, पूजनं चैव न जानामि सर्वस्व परमेश्वरी। ब्रह्मचारिणी की ध्यान- वन्दे वांछित लाभायचेंद्रार्घकृतशेखराम्।
धवल परिधाना ब्रह्मरूप पुष्पलंकार भूषिताम् ब्रह्म परम वंदना पल्लवराधरण कांत कपोला पीन।
पयोधराम् कमनीया लावण्य स्मरिलन निम्ननाभि नितम्बनीम् कम मां का मंत्र- या देवी सर्वभूतेषु मां ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: ।।धना कर पद्मभ्याम अक्षमाला कम पंडालू।
देवी प्रसीदतु मा ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा .. ब्रह्मचारिणी की स्तोत्र पाठ- तपश्चारिणी त्वंहि तपत्रय व्यवधानम्।
ब्रह्मरूपधर्मचारिणी प्रणमाम्यम् ब्रह्म शंकरप्रिया त्वहि भुक्ति-मुक्ति वर्दिनी।
शान्तिदा ज्ञानदा ब्रह्मचारिणीप्रणम्यहम् दा ब्रह्मचारिणी की कवच- त्रिपुरा में हृदयं पातु ललाटे पातु शंकरभामिनी।
अर्पण सदापातु नेत्रो, अर्ध च कपोलो ातु पंचदशी कण्ठे पातुमध्यदेशे पातुमहेश्वरी ठे
षोडशी सदापातु नाभो गृहो च पादयो। अंग प्रत्यंग सतत पातु ब्रह्मचारिणी।

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