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बिना किसी स्वार्थ के दान करने के कारण ही कर्ण कहलाये 'दानवीर कर्ण '

Thursday, 16 Jan 2020 03:13:00 PM

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देवी कुंती के पुत्रों में से सबसे ज्येष्ठ पुत्र, सूर्यदेव के अंश, सूर्यपुत्र कर्ण जो महाभारत की गाथा के एक अहम किरदार हैं. कर्ण को कईं नामों से जाना जाता है। सूर्यदेव के पुत्र होने के कारण- सूर्यपुत्र कर्ण अंग राज्य के राजा होने के कारण- अंगराज कर्ण, सारथी आदिरथ एवं देवी राधा द्वारा गोद लेने के कारण- सूतपुत्र कर्ण देवी राधा के राधे और दुर्योधन के मित्र कर्ण. इन्हीं नामों में से एक है,_दानवीर कर्ण_.

कर्ण को दानवीर उनके कर्मों के कारण कहा जाता है. साधारण परिस्तिथियों में हर कोई अपनी क्षमता के अनुसार दान देता है, लेकिन दानवीर तो वही है, जो परिस्तिथियों के अनुकूल ना होने के बावजूद भी अपना सर्वस्व का भी दान कर दे. कर्ण को दानवीर कर्ण बनाने वाले दान निम्नलिखित हैं- कर्ण महाभारत का एक अहम् पात्र था। उनकी प्रशंशा युगों युगों से की जाती है। वह कुशल होने के साथ साथ एक बहुत अच्छा योद्धा भी था। कर्ण की वास्तविक माँ कुंती व पिता सूर्य थे। कुंती के विवाह से पहले ही कर्ण का जन्म हो गया था, इसलिए लोक लज्जा के कारण उन्होंने उसे नदी में बहा दिया।

अधिरथ ने कर्ण को नदी में पाया तो वे करुणा कर के उसे अपने साथ ले गए और अपने पुत्र की तरह उसका पालन पोषण किया।बालक के शरीर पर कवच और कुण्डल देखने के बाद अधिरथ समझ गए के वह कोई होनहार राजकुमार है, तो उन्होंने उसका नाम वसुषेण रखा।

वसुषेण के बड़े होने के उपरांत उन्होंने शास्त्रों का अध्ययन कराना शुरू कर दिया। कर्ण सूर्य का बहुत बड़ा उपासक था। वह सुबह से शाम तक उपासना में ही विलीन रहता था। उपासना के समय अगर कोई उनसे कुछ मांगता तो वे कभी उसे निराश नहीं करते थे। उनके जैसा दानवीर पांडवों और कौरवों में कोई नहीं था। इसी खूबी के कारण उन्हें दानवीर कर्ण के नाम से भी जाना जाता था। वे कभी किसी याचक को खाली हाथ नहीं जाने देते थे और यही उनकी मृत्यु का कारण भी बना।

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_चन्दन की लकड़ियां_

श्री कृष्णा की एक यह लीला जब एक ब्राह्मण युधिष्ठिर से हवन के लिए, चन्दन की लकड़ियां मांगने आया. युधिष्ठिर के कोषागार में सुखी चन्दन की लकड़ियां ना होने के कारण, उन्होंने अपने भाइयों से लकड़ियां एकत्रित करने को कहा। जब वह भी असमर्थ रहें, तब पांडव, श्री कृष्णा एवं वह ब्राह्मण कर्ण के महल की और चल दिए. ब्राह्मण ने कर्ण से भी वही मांग की और कर्ण के कोषागार में भी लकड़ियां नहीं थी, तब कर्ण ने अपने महल के दरवाज़े एवं खिड़कियों में लगी चन्दन की लकड़ियों को काट उस ब्राह्मण को दे दिया.

कवच और कुंडल

कर्ण के कवच और कुंडल की गाथा कौन नहीं जानता. यह बात सभी जानते और समझते थे की इन दोनों के होते, कर्ण को कोई भी पराजित नहीं कर सकता. अपने पुत्र अर्जुन की रक्षा करने हेतु, देवराज इंद्र ने ब्राह्मण का रूप धारण कर कर्ण से उनके कवच और कुंडल को दान में माँगा. यह जानते हुए भी की अपने कवच और कुंडल को त्याग देने से उनकी जान को खतरा है, फिर भी कर्ण ने बिना संकोच किये अपने कवच और कुंडल को ब्राह्मण रुपी देवराज इंद्रा को दान में दे दिया.

_सोने का वह पहाड़_

सिर्फ दान देने से ही कोई दानवीर नहीं कहलाता. दान देते वक़्त आपका मन साफ़ एवं निस्वार्थ होना चाहिए. जब अर्जुन ने श्री कृष्णा से पुछा की कर्ण को सबसे बड़ा दानवीर क्यों कहा जाता है, जबकि स्वयं अर्जुन ने भी बहुत दान पुण्य किया है कर्ण से भी ज़्यादा, तब श्री कृष्णा ने एक पहाड़ को सोने का बना दिया. पहले उन्होंने अर्जुन से कहा की वह इस सोने को गांव के गरीब लोगों में बाँट दें. अर्जुन ने अपने सहायक से कहा की वह गांव वालों को पहाड़ के पास एकत्रित करें, ताकि अर्जुन उन्हें सोना दान में दे सकें. अर्जुन ने 12 घंटों तक खुदाई की लेकिन वह उस पहाड़ से 1% सोना ही निकाल पाए और थकान के कारण, उन्होंने दान अगले दिन देने की बात कही.

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यही कार्य श्री कृष्णा ने कर्ण को सौंपा। कर्ण गांव वालों को उस सोने के पहाड़ के पास ले गए और कह 'यह पहाड़ मैं आप लोगों को दान में देना चाहता हूँ, आप जितना चाहे यहाँ से उतना सोना ले जा सकते हैं.'/ और फिर वह वहां से चले गए. जिस कार्य को करने हेतु अर्जुन को 12 घंटे लग गए, वही कार्य कर्ण ने कुछ ही क्षणों में कर दिया. श्री कृष्णा ने अर्जुन को समझाया की- हे अर्जुन दान देते समय तुम यह चाहते थे की लोग इस दान के लिए, तुम्हारे आभारी हों. तुम्हें इस महा दान के लिए याद रखें, किन्तु कर्ण ने बिना किसी स्वार्थ के दान का यह कार्य पूर्ण किया.

जो दान देते समय किसी प्रतिफल की उम्मीद न करे वही सबसे बड़ा दानवीर है.

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